"वो घुटने जो कभी नहीं झुके थे"
पति की मृत्यु के बाद अकेले तीन बच्चों को पाला। दिन में मज़दूरी, रात में सिलाई का काम। कभी हिम्मत नहीं हारी, कभी घुटने नहीं टेके - न किसी के आगे, न ज़िंदगी के आगे।
लेकिन पिछले तीन साल से... उन्हीं घुटनों ने साथ छोड़ना शुरू कर दिया। सुबह उठते वक्त एक कराह निकल जाती, जिसे वो हमेशा दबा लेती थीं ताकि बच्चे परेशान न हों। अकेले में, कोने में बैठकर, वो अपने घुटनों को सहलाती और चुपचाप सह लेती थीं।
वो दर्द जो उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया
एक दिन बेटी रेखा अचानक घर आई। दरवाज़ा खोलते वक्त माँ लड़खड़ा गई।
बेटी की आँखों में आँसू आ गए - "माँ, आपने बताया क्यों नहीं?"
कमला देवी चुप रहीं। बस इतना बोलीं - "तुम सब की चिंता में अपनी चिंता कहाँ याद रहती है, बेटा।"